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| LIVER (FATTY LIVER IS SILENT DISEASE WITHOUT SYMPTOMS ) |
LIVER
(FATTY LIVER IS SILENT DISEASE WITHOUT
SYMPTOMS )
जिगर शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि है जिसका
सामान्य वयस्क में भार लगभग 1.5 किग्रा. होता है।
यह उदर गुहा के ऊपरी दाहिने भाग में डायाफ्राम के
नीचे स्थित रहती है तथा लगभग पूरे दाहिने
हाइपोकोण्ड्रियम को घेरे रहती है। इसकी ऊपरी
सतह उत्तल (convex) होती है तथा निचली सतह
अवतल (Concave) होती है। इसके नीचे आमाशय,
ग्रहणी का प्रथम भाग तथा बड़ी आंत (कोलन) का
दाहिना भाग स्थित होता है। इसका बायां
किनारा कुछ नुकीला तथा दायां किनारा रूखा
(blunt) होता है।
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रचना (Structure)-
जिगर संयोजी ऊतक के एक परत से आच्छदित रहता है।
जिसे ग्लिसन्स कैप्सूल (Glisson’s capsule) कहते हैं।
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जिगर
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पेट की अग्रमध्य भित्ति से संलग्न एक मीजोन्ट्री के
द्वारा दो मुख्य खण्डों (Lobes) में बंट जाता है। इसे
फैल्सीफॉर्म लिगामेन्ट (Falciform ligament) कहते
हैं। इसका दाहिना खण्ड बाएं खण्ड की अपेक्षा
लगभग छः गुना बड़ा होता है तथा दाहिने
गुर्दे एवं बड़ी आंत के दाहिने कोलिक (हेपिटिक)
फ्लेक्सर के ऊपर स्थित रहता है। बायां खण्ड आमाशय
के ऊपर स्थित रहता है। जिगर का दायां खण्ड अपनी
पश्चज (Ventral) सतह पर और दो खण्डों में
विभाजित रहता है। एक ऊपर का आयताकार खण्ड
(Quadrate lobe) दूसरा नीचे का पुच्छक खण्ड
(Caudate lobe) होता है।
आयताकार एवं पुच्छक खण्डों के बीच एक अनुप्रस्थ
दरार होती है, जिसे पोर्टा हिपेटिस (porta
hepatis) या जिगर द्वार (liver door) कहते है। इसमें से
होकर जिगर में निम्नलिखित रक्त वाहिनियों,
तन्त्रिकाओं, लसीका वाहिनियों एवं वाहिकाओं
(ducts) का आना-जाना होता है।
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1. जिगर धमनी (Hepatic artery)- यह उदरीय
महाधमनी की शाखा और सीलियक धमनी की
प्रशाखा होती है। यह धमनी जिगर में शुद्ध
(oxygenated) रक्त पहुंचाती है। जिगर में पहुंचने वाले
रक्त का लगभग 20 प्रतिशत भाग इसी के द्वारा
पहुंचता है।
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2. प्रतिहारी या पोर्टल शिरा (Portal vein)- यह
प्लीहज शिरा (Splenic vein) और ऊर्ध्व
आन्त्रयोजनीय शिरा से बनी होती है तथा
आमाशय, छोटी एवं बड़ी आंत, अग्न्याशय और
प्लीहा से रक्त लाकर जिगर में पहुंचाती है। शेष 80
प्रतिशत रक्त इसी के द्वारा जिगर में पहुंचता है। इस
रक्त में छोटी आंत द्वारा अवशोषित पोषक तत्व
(nutrients) मौजूद रहते हैं।
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3. जिगर शिरा (hepatic vein) - यह जिगर में आये हुए
रक्त को निम्न महाशिरा (Inferior vena cava) में
पहुंचाती है।
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4. जिगर वाहिकाएं (Hepatic ducts)- पित्त
वाहिकाओं को सूक्ष्म पित्त नलिकाएं (bile
canaliculi) कहा जाता है। यह पित्त कोशिकाओं
(bile capillaries) से निर्मित होती है, जो जिगर
की कोशिकाओं से पित्त को एकत्रित करने के बाद
संयोजित होती है। जिगर द्वारा स्रावित पित्त
सूक्ष्म पित्त नलिकाओं में पहुंचता है, जहां से यह
दाहिनी एवं बायीं जिगर वाहिकाओं (Right & left
hepatic ducts) में पहुंचता है। ये दोनों जिगर
वाहिकाएं पित्ताशय (Gall bladder) से निकली
पित्ताशयी या सिस्टिक वाहिका (Cystic duct)
से एक बिन्दु पर मिलकर उभय पित्त वाहिका
(Common bile duct) बनाती है। कॉमन बाइल डक्ट
मुख्य अग्नयाशयिक वाहिका (Pancreatic duct) से
संयुक्त हो जाती है और फिर ग्रहणी के दूसरे भाग में
खुलती है।
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सूक्ष्म रचना- जिगर के खण्ड बहुत से छोटे-छोटे
खण्डकों (lobules) से मिलकर बने होते हैं। यह
पंचकोणीय या षट्कोणीय आकृति के होते हैं।
ज्यादातर खण्डक लगभग 1 मिलीलीटर डाइमीटर के
होते हैं और उनमें केन्द्रीय शिरा (Central vein) रहती
है। खण्डकों के भीतर जिगर कोशिकाएं
(Heptocytes) एक
कोशिका मोटाई वाली परतों में व्यवस्थित रहती है
तथा केन्द्रीय शिरा से खण्डक के किनारे (Edge)
की ओर फैलती है। हर खण्डक के कोने (Corner) में एक
प्रतिहारी क्षेत्र (Portal area) होता है, जो पोर्टल
शिरा, जिगर धमनी (hepatic artery), पित्त
वाहिका (bile duct) एवं तन्त्रिका की शाखाओं से
मिलकर बना होता है।
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जिगर कोशिकाओं की पंक्तियों के बीच-बीच में
शिरानालाभ (Sinusoids) मौजूद रहते हैं, जो पोर्टल
शिरा एवं जिगर धमनी की शाखाओं से रक्त का
परिवहन करते हैं। प्रतिहारी क्षेत्र की धमनी एवं
शिरा से रक्त शिरानालाभ में बहता है। फिर यह
केन्द्रीय शिरा में पहुंचता है जहां से यह खण्डक से
जिगर शिरा में पहुंचता है। शिरानालाभ की
भित्तियां एण्डोथीलियल कोशिकाओं से आस्तरित
रहती है। इन आस्तरित कोशिकाओं से फैगोसाइटिक
स्टीलेट रेटिक्युलोएण्डोछीलियल कोसिकाएं संलग्न
रहती है, जो जिगर में होकर गुजरने वाले जीर्ण- शीर्ष
लाल एवं श्वेत रक्त कोशिकाओं, सूक्ष्म जीवाणुओं
एवं अन्य बाह्य पदार्थों को पचा लेती है।
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जिगर के कार्य (Functions of the liver)- जिगर
रासायनिक क्रियाओं द्वारा भोजन के पोषक
तत्वों को ऊतकों के उपयोग योग्य बना देता है तथा
आवश्यकता पड़ने तक उन्हें जमा करके रखता है। इस
प्रकार जिगर के कार्यों को तीन भागों में बांटा
जा सकता है- चयापचयी (metabolic), संग्रही
(Storage) एवं स्रावी (Secretory)। इनके अलावा
जिगर उत्सर्जन (Excretion) में भी संलिप्त रहता है।
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चयापचयी कार्य (metabolic functions)-
1. यह कार्बनिक यौगिकों से अमीनों एसिड्स को
अलग करता है।
2. यह जीर्ण-शीर्ण ऊतक कोशिकाओं (प्रोटीन्स) से
यूरिया का निर्माण करता है तथा अधिक अमीनो
एसिड्स को यूरिया में बदल देता है।
3. यह ज्यादातर प्लाज्मा प्रोटीन्स का निर्माण
करता है।
4. चयापचयी हिपेरिन (heparin) का निर्माण
करता है तथा अमीनो एसिड्स से रक्त स्कन्दक
कारकों प्रोथ्रॉम्बिन (prothrombin) एवं
फाइब्रिनोजन (Fibrinogen) के संश्लेषण में मदद करता
है।
5. यह बिलिरूबिन को रक्त से अलग करता है।
6. चयापचयी गैलेक्टोज़ एवं फ्रक्टोज़ को ग्लूकोज में
बदल देता है।
7. यह वसीय अम्लों (Fatty acids) का ऑक्सीकरण
करता है।
8. यह रक्त की मृत लाल कोशिकाओं (erythrocytes)
को रक्त से अलग कर देता है तथा हीमेटिन (hematin)
को जमा कर लेता है।
9. चयापचयी प्लाज्मा मेम्ब्रेन्स के लिए आवश्यक
संघटक- लाइपोप्रोटीन्स,
कॉलेस्ट्राल एवं फॉस्फोलिपिड्स का निर्माण
करता है।
10. यह कार्बोहाइड्रेट्स एवं प्रोटीन्स को वसा में
बदल देता है।
11. यह औषधियों एवं विषैले पदार्थों का
निर्विषीकरण (Detoxification) करता है।
12. यह कैरोटीन (Carotene) से विटामिन A संश्लेषण
करता है।
13. एन्टीबॉडीज एवं एन्टीटॉक्सिन्स का निर्माण
करता है।
14. यह शरीर के तापक्रम को बनाए रखता है। इसमें
अनेक चयापचय क्रियाएं होती रहती है, जिसके
फलस्वरूप जो
रक्त इससे अन्य अंगों में जाता है, उसमें ऊष्मा बढ़
जाती है और इस तरह शरीर की ऊष्मा को बनाए
रखता है।
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संग्रही कार्य (Storage functions)-
जिगर शरीर का मुख्य संग्रही केन्द्र होता है। यह
ग्लूकोज को ग्लाइकोजन के रूप में जमा करके रखता है
तथा शरीर की आवश्यकता के अनुसार एन्जाइम्स की
मदद से यह ग्लाइकोजन को दुबारा ग्लूकोज में बदल
देता है।
इसमें वसा में घुलनशील
विटामिन्स (A, D, E, एवं K), एन्टी-एनीमिक फैक्टर
(विटामिन्स B12 ), भोजन से प्राप्त अमीनो
एसिड्स भी जमा रहते हैं।
स्रावी कार्य (Secretory functions)- पाचक अंग के
रूप में जिगर के मुख्य कार्यों में से एक पित्त (बाइल)
का स्राव करना होता है। पित्त (bile) जिगर की
कोशिकाओं द्वारा स्रावित होने वाला एक गाढा
पीला-हरा द्रव होता है। यह क्षारीय होता है और
इसमें जल, सोडियम कार्बोनेट, पित्त लवण (bile
salts), पित्त रंजक (bile pigments), कॉलेस्टेरॉल,
म्यूसिन, लेसिथिन एवं बिलिरूबिन रहते हैं। जिगर
रोजाना औसतन 1 लीटर पित्त का स्राव करता है
जो पित्ताशय में जमा रहता है। जब भोजन आमाशय
से ग्रहणी में पहुंचता है तो पित्ताशय ग्रहणी में पित्त
का स्राव कर देता है जहां पर यह वसाओं को
इमल्सीकृत कर उनके अवशोषण में मदद करता है। पित्त
का स्राव रासायनिक, हॉर्मोनल (सेक्रीटिन)
अथवा तन्त्रिका-तन्त्र की क्रियाशविधियों से भी
बढ़ जाता है.
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फैटी लिवर -लिवर (जिगर)पर अधिक चर्बी जमा हो
जाने को फैटी लिवर या चर्बी युक्त जिगर कहते है |
जब जिगर पर चर्बी बढ़ जाती है तब जिगर पसलियों
से काफी निचे तक स्पष्ट अनुभव होती है तब जिगर
वाले स्थान को छूने से वह चिकना महसूस होता है
,अर्थात सामान्य यकृत ऊतकों के बीच के रिक्त
स्थान को ये फैटी-लिवर कोशिकाएं कब्ज़ा कर लेती
है ,जिस कारन कोशिकाओ के समूह ऊतकों में काफी
फैलाव् एवम भारीपन उत्पन्न हो जाता है .
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कारण-लिवर में स्थित इस असामान्य स्थिति के 2
कारण है -१-अल्कोहलिक .२-नॉन -अल्कोहलिक ,
अक्सर जो लोग सामान्य या अधिक मात्रा में
निरंतर शराब का सेवन करते है वे कालांतर में फैटी
लिवर डिजीज से पीड़ित हो सकते है इसके आलावा
अल्कोहलिक लिवर डिजीज माता -पिता से भी
बच्चो में आ सकती है | इसके आलावा हेपेटाइटिस-सी
,आयरन ओवरलोड ,मोटापा,एवम खान पान की
गड़बड़ी भी इसका कारण बन सकती है |
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fatty liver is a very common problem now a day
God has given enough regneration power to over
liver cell but that does not mean that we should
keep drinking alcohol and keep ignoring over diet
and keep hunting over liver.
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10 COMMON SYMPTOMS OF LIVER PROBLEM
1-FATIGUE.
2-OBESITY.
3-GENETICS BY.
4-JAUNDICE.
5-YELLOW URINE.
6-SKIN CHANGES.
7-ABDOMINAL PAIN IN CENTERE IN THE RIGHT
UPPER PORTION OF ABDOMEN.
8-NO SYMPTOMS-DUE THIS SILENT KILLER.
9-FLUID RETENTION.
10-MUSCLES WASTING.
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AVOIDS-
-ARTIFICIAL FOODS,ALCOHOL.
-REFINED CARBOHYDRATE,DEEP FRIED &
PROCESSED FOOD.
-AVOID DAIRY FOODS,
-AVOID SUGARLY PROCESSED FOODS &
DRINKS.
-AVOID CHICKEN.
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TOP FIVE HOMOEOPATHIC MEDICINES
1-CHELIDONIUM.
2-LYCO.
3-PHOS.
4-CALC CARB.
5-NUX-VOM.
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घरेलु उपचार -
डिकामाली -लगभग १ ग्राम का चौथा भाग की
मात्रा में डिकामाली (एक तरह का गोंद )को गर्म
पानी में घोलकर चन ले और उसे सुबह - शाम रोगी को
पिलाये ,उससे यकृत और शरीर के अन्य भागो की
चर्बी नश्ट होती है .
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टिप्पणी -कोई भी प्रयोग करने से पहले किसी अच्छे
डॉक्टर की सलाह ले .

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