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| गूलर के औषधीय प्रयोग |
======================गूलर======================
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गूलर का पेड़ सारे संसार मे बहुत प्रसिद्ध है। पके हुए गूलर की सब्जी बनायी जाती है। गूलर की छाया ठंडी और सुखकारी होती है। गूलर की लकड़ी बहुत मजबूत और चिकनी होती है। गूलर के फलों का आकार अंजीर के फल जैसा होता है। गूलर का पेड़ अधिकतर झरने या पानी के स्थान के आस-पास होता है। गूलर के पेड़ के पास कुंआ खोदने से पानी जल्दी निकल आता है। गूलर की छाया में खुदे हुए कुंऐ का पानी बहुत गुणकारी होता है और इसमें बहुत से रोगों को नष्ट करने के गुण पाये जाते हैं।महाराष्ट्र में तो ऐसा माना जाता है की गूलर के वृक्ष में भगवान दत्तात्रेय का वास होता है।
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गूलर का पेड़ 6 मीटर से 12 मीटर तक ऊंचा होता है। गूलर का तना, मोटा, लम्बा, तथा टेढ़ा होता है। गूलर की छाल लाल व मटमैली रंग की होती है। गूलर के पत्ते 3 से 5 इंच लम्बे, 1.5 से 3 इंच चौडे़, नुकीले, चिकने और चमकीले होते हैं। इसके फूल अक्सर दिखाई नहीं देते हैं। गूलर के फल गर्मी के मौसम में 1 से 2 इंच व्यास के गोलाकार अंजीर के फल के समान होते हैं तथा ये गुच्छों में होते हैं। गूलर के कच्चे फल हरे रंग और पके फल लाल रंग के होते हैं। गूलर के फल को थोड़ा सा दबाते ही वह फूट जाता है और इसमें सूक्ष्म कीटाणु भी पाये जाते हैं। गूलर के पेड़ के सभी अंगों में दूध भरा होता है और यदि इसके किसी भी भाग को धारदार चीज से काटते हैं तो उस भाग से दूध निकलने लगता है। इसका दूध जब शुरू-शुरू में निकलता है तो वह सफेद रंग का होता है लेकिन हवा के संपर्क में आते ही कुछ ही देर में पीला हो जाता है। इसके दूध का उपयोग औषधियों के रूप में किया जा सकता है क्योंकि इसमें रोगों को ठीक करने की शक्ति होती है।
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================गूलर का वृक्ष=============
गूलर की प्रकृति ठंडी होती है तथा यह घाव को भरने वाला होता है। यह रूखा तथा स्वाद में मीठा, फीका तथा भारी होता है। यह कफ, पित्त, अतिसार और योनि रोग को ठीक करता है।
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===============गूलर की छाल===============
गूलर की छाल की प्रकृति ठंडी होती है। इसके छाल में दूध भर रहता है तथा यह स्वाद में फीकी होती है। यह गर्भ के लिए लाभकारी तथा घावों को भरने वाली होती है।
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=================कच्चे गूलर==============
कच्चे गूलर स्तंभक, फीके और गुणकारी होते हैं तथा यह प्यास को खत्म करने वाला, पित्त, कफ और रक्तविकार को भी दूर करने वाला होता है।
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==================साधारण गूलर==============
गूलर के फल स्वाद में मीठे तथा फीके होते हैं। साधारण गूलर की प्रकृति ठंडी होती हैं। यह पित्त, प्यास और मोह को उत्पन्न करने वाला होता है। उल्टी, रक्तस्राव और प्रदर रोग को यह ठीक कर सकता है।
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==================पके गूलर====================
पके गूलर स्वाद में फीका तथा मीठा होता है। यह पेट में कीडे़ पैदा करने वाला होता है। इसकी प्रकृति ठंडी होती है। रक्तदोष (खून की खराबी), पित्त, जलन, सांस रोग तथा बेहोशी को यह नष्ट करता है। यह भूख को बढ़ाने वाला होता है। यह कफ को उत्पन्न करने वाला तथा भोजन करने की रुचि को बढ़ाने वाला होता है। यह प्यास और थकावट को दूर करने वाला होता है। यह सूखी खांसी और शरीर की जकड़न को दूर कर सकता है। गूलर के लकड़ी के राख को गर्मी के मौसम में होने वाले घावों पर लगाने से लाभ मिलता है।
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==================पुराने गूलर==================
पुराने गूलर स्वाद में फीके तथा खट्टे होते हैं। यह शरीर में मांस की वृद्धि करने वाला होता है तथा यह खून की खराबी को दूर करने वाला होता है।
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===============आर्युवेदिक मतानुसार==============
गूलर स्वाद में मीठा, कषैला, भारी तथा इसकी प्रकृति ठंडी होती है। पित्त, कफ, रक्तविकार को यह नष्ट करता है। गर्भ से सम्बंधित रोग, रक्तप्रदर, मधुमेह, आंखों के रोग, अतिसार, सूखा रोग, पेशाब से सम्बंधित रोग तथा प्रमेह रोग को यह ठीक कर सकता है। इसके सेवन से शरीर में ताकत की वृद्धि होती है तथा हडि्डयों को जोड़ने में यह लाभकारी है।
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================यूनानी चिकित्सकों के अनुसार===========
गूलर दूसरे दर्जे में गर्म और पहले दर्जे में गीला होता है। यह आंखों के रोग, सीने के दर्द, सूखी खांसी, गुर्दे और तिल्ली के दर्द, सूजन, खूनी बवासीर, खून की खराबी, रक्तातिसार (खूनी दस्त), कमर दर्द एवं फोड़े-फुन्सियों को ठीक करने में लाभकारी होता है।
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==================वैज्ञानिक मतानुसार============
गूलर का रासायनिक विश्लेषण करने पर यह पता चला है कि इसके फल में कार्बोहाइड्रेट 49 प्रतिशत, रंजक द्रव्य 8.5 प्रतिशत, भस्म 6.5 प्रतिशत, अलब्युमिनायड 7.4 प्रतिशत, वसा 5.6 प्रतिशत, आर्द्रता 13.6 प्रतिशत पाया जाता है। इसमें कुछ मात्रा में फास्फोरस व सिलिका भी पाया जाता है। इसकी छाल में 14 प्रतिशत टैनिन और दूध में 4 से 7.4 प्रतिशत तक रबड़ होता है।
गूलर का पका फल खाने में मीठा लगता है। मीठा होने के कारण इसमें कीड़ें आसानी से लग जाते हैं। इसका सेवन करने से पहले इसे अच्छी तरह से देख लें कि कहीं इसमें कीड़े तो नहीं हैं यदि कीड़े लगे हों तो उन्हें निकालकर गूलर के सही भाग को सुखाकर उपयोग में लेना चाहिए। गूलर के पकने के दिनों इसका एक-दो फल नियमित रूप से दो हफ्ते तक खाया जाए तो कई प्रकार के आंखों के रोगों से बचा जा सकता है।
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वायु से अंग जकड़ना: गूलर का दूध जकड़न वाले अंग पर लगाकर इस पर रूई चिपकाएं इससे लाभ मिलेगा।
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पके हुए हुए गूलर, गुड़ या शहद के साथ खाना चाहिए अथवा गूलर की जड़ को घिसकर चीनी के साथ खाने से लाभ मिलेगा और रक्तपित्त दोष दूर हो जाएगा।
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गूलर की छाल के रस में घी मिलाकर गर्म करके रोगी को इसका सेवन कराने से सिंगिया का जहर उतर जाता है।
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गूलर के दूध से आंखों पर लेप करें इससे आंखों का दर्द दूर होता है।
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फोड़े पर गूलर का दूध लगाकर उस पर पतला कागज चिपकाने से फोड़ा जल्दी ठीक हो जाता है।
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गूलर की 4-5 बूंद दूध को बताशे में डालकर दिन में 3 बार सेवन करने से अतिसार (दस्त) के रोग में लाभ मिलता है।
आंव या अतिसार (दस्त) में गूलर की जड़ के चूर्ण को 3 से 5 ग्राम की मात्रा में ताजे फल के साथ दिन में दो बार सेवन करने से लाभ मिलता है।
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गूलर की 10 ग्राम पत्तियां को बारीक पीसकर 50 मिलीलीटर पानी में डालकर रोगी को पिलाने से सभी प्रकार के दस्त समाप्त हो जाते हैं।
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बच्चों के अतिसार (दस्त) तथा रक्तातिसार (खूनी दस्त), वमन (उल्टी) और कमजोरी में गूलर का दूध 10 बूंद सुबह और शाम दूध में मिलाकर सेवन कराएं इससे लाभ मिलता है।
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गूलर की जड़ का पानी गर्भवती स्त्री को सेवन कराएं इससे उसका अतिसार रोग ठीक हो जाता है।
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गर्मी के कारण जीभ पर छाले होने पर गूलर के कांटे और मिश्री को पीसकर सेवन करने से लाभ मिलता है।
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गूलर के रस में मिश्री डालकर बच्चों को पिलाने से शीतला (चेचक) की गर्मी दूर होती है।
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जहां पर बिच्छू ने काटा हो उस स्थान पर गूलर के अंकुरों को पीसकर लगाए इससे जहर चढ़ता नहीं है और दर्द से आराम मिलता है।
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गूलर के पत्तों पर उठे हुए कांटों को पीसकर इसे मीठे या दही मिला दें और इसमें चीनी मिलाकर रोजाना 1 बार सेवन करें इससे कंठमाला के रोग से मुक्ति मिलती है।
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गूलर के पत्तों पर उठे हुए कांटों को गाय के ताजे दूध में पीसकर इसमें थोड़ी सी चीनी मिलाकर चेचक से पीड़ित रोगी को पिलाये इससे उसका शीतला (चेचक) रोग ठीक हो जाएगा।
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बच्चों के गाल की सूजन को दूर करने के लिए उनके गाल पर गूलर के दूध का लेप करें इससे लाभ मिलेगा।
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भिलावें की धुएं से उत्पन्न हुई सूजन को दूर करने के लिए गूलर की छाल को पीसकर इससे सूजन वाली भाग पर लेप करें।
================================================= शरीर के किसी भी अंग पर गांठ होने की अवस्था में गूलर का दूध उस अंग पर लगाने से लाभ मिलता है।
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40 ग्राम गूलर की छाल को 1 लीटर पानी में उबालकर काढ़ा बना लें और इसमें मिश्री मिलाकर पीने से उपदंश की बीमारी ठीक हो जाती है।
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शरीर के अंगों में घाव होने पर गूलर की छाल से घाव को धोएं इससे घाव जल्दी ही भर जाते हैं।
गूलर के पत्तों को छांया में सूखाकर इसे पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इसके बाद घाव को साफ करकें इसके ऊपर इस चूर्ण को छिड़के तथा इस चूर्ण में से 5-5 ग्राम की मात्रा सुबह तथा शाम को पानी के साथ सेवन करें इससे लाभ मिलेगा।
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गूलर की जड़ के रस में चीनी और काला जीरा मिलाकर सेवन करने से सूजाक रोग ठीक होता है।=================================================
गूलर के फूलों के चूर्ण को छानकर उसमें शहद एव मिश्री मिलाकर गोली बना लें। रोजाना 1 गोली का सेवन करने से 7 दिन में प्रदर रोग से छुटकार मिल जाता है।
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गूलर के पके फल को छिलके सहित खाकर ऊपर से ताजे पानी पीयें इससे श्वेत प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
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पके गूलर के फलों को सुखाकर इसे कूटे और पीसकर छानकर चूर्ण बना लें। फिर इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी ढक्कनदार बर्तन में भर कर रख दें। इसमें से 6 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह-शाम दूध या पानी के साथ सेवन करने से रक्तप्रदर ठीक हो जाता है।
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रोजाना दिन में 3-4 बार गूलर के पके हुए फल खाने से श्वेत प्रदर में लाभ मिलता है।
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गूलर का रस 5 से 10 ग्राम मिश्री के साथ मिलाकर नाभि के निचले हिस्से में पूरे पेट पर इससे लेप करें। इससे श्वेत प्रदर रोग में आराम मिलता है।
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1 चम्मच गूलर के फलों के चूर्ण को 1 कप पानी के साथ दोनों समय भोजन के बाद नियमित रूप से सेवन करने से पेशाब में शर्करा आना बंद हो जाता है। इसके साथ ही गूलर के कच्चे फलों की सब्जी नियमित रूप से खाते रहना अधिक लाभकारी होता है। मधुमेह रोग ठीक हो जाने के बाद इसका सेवन करना बंद कर दें।
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गूलर का दूध कुछ बूंदों की मात्रा में मां या गाय-भैंस के दूध के साथ मिलाकर नियमित रूप से कुछ महीने तक रोजाना 1 बार बच्चों को पिलाने से शरीर हृष्ट-पुष्ट और सुडौल बनाता है लेकिन गूलर के दूध बच्चों उम्र के अनुसार ही उपयोग में लेना चाहिए।
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गूलर की छाल के काढे़ से गरारे करते रहने से दांत और मसूड़ों के सारे रोग दूर होकर दांत मजबूत होते हैं।
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नाक से, मुंह से, योनि से, गुदा से होने वाले रक्तस्राव में गूलर के दूध की 15 बूंदे 1 चम्मच पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से लाभ मिलता है।
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शरीर में कहीं से भी किसी कारण से रक्तस्राव (खून बहना) हो रहा हो तो गूलर के पत्तों का रस निकालकर वहां पर लगाएं इससे तुरन्त खून का आना बंद हो जाता है।
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मुंह में छाले हो अथवा खून आता हो या खूनी बवासीर हो तो 1 चम्मच गूलर के दूध में इतनी ही पिसी हुई मिश्री मिलाकर रोजाना खाने से रक्तस्राव (खून बहना) होना बंद हो जाता है तथा इसके सेवन से मुंह के छाले भी ठीक हो जाते हैं।
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5 बूंद गूलर के दूध को 1 बताशे पर डालकर इसका सेवन बच्चों को कराएं इससे सूखा रोग (रिकेटस) ठीक हो जाता है।
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रोजाना पके हुए गूलर को खाकर उसके ऊपर से गर्म दूध पीने से हृदय रोग में लाभ मिलता है। गूलर लगातार खाते रहने से रक्तवाहनियों (खून की नसों) में लचक और कोमलता आती है।
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जलने पर गूलर की हरी पत्तियां पीसकर लेप करने से जलन दूर हो जाती है।
गूलर के पत्तों को पीसकर शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से जलन मिट जाती है और छाले के निशान भी नही पड़ते।
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1 चम्मच गूलर के कच्चे फलों के चूर्ण को 2 चम्मच शहद और दूध के साथ सेवन करने से पेशाब का अधिक मात्रा में आने का रोग दूर हो जाता है।
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पेशाब में खून आने पर गूलर की छाल 5 ग्राम से 10 ग्राम या इसके फल 2 से 4 लेकर पीस लें और इसमें चीनी मिलाकर दूध के साथ खायें इससे यह रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
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1 बताशे में 10 बूंद गूलर का दूध डालकर सुबह-शाम सेवन करने और 1 चम्मच की मात्रा में गूलर के फलों का चूर्ण रात में सोने से पहले लेने से धातु दुर्बलता दूर हो जाती है। इस प्रकार से इसका उपयोग करने से शीघ्रपतन रोग भी ठीक हो जाता है।
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गूलर के पत्तों का रस चोट लगे हुए स्थान पर लगने से खून बहना रुक जाता है।
गूलर के रस को रूई में भिगोकर इसे चोट पर रखकर पट्टी बांध लें इससे चोट जल्दी भरकर ठीक हो जाएगा।
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गूलर की जड़ के रस में मिश्री मिलाकर 2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम रोगी को पिलाने से खसरा रोग ठीक हो जाता है।
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गूलर के कच्चे फलों को छाया में सुखाकर, पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 2-2 ग्राम चूर्ण को गुनगुने पानी के साथ रोगी को खिलाने से खसरा रोग में लाभ मिलता है।
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गूलर के फलों का चूर्ण 1-1 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करते रहने और सोते समय जड़ की छाल का चूर्ण 1 चम्मच 1 चम्मच मिश्री के साथ रोजाना सेवन करने से गर्भस्राव नहीं होता।
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गूलर का फल पीसकर पेट पर लेप करने से पेट दर्द ठीक हो जाता है। पेट में गैस बनने तथा आंतों की सूजन में इस प्रकार से उपचार करना लाभदायक होता है।
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गूलर की पेड़ की छाल उतारकर छाया में सुखा लें और फिर इसे पीसकर चूर्ण बना लें और फिर इसे छानकर बोतल में भरकर ढक्कन लगाकर रख दें। इसमें से चूर्ण का सेवन प्रतिदिन करने से दमा रोग में लाभ मिलता है।
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सितम्बर से मार्च तक की हर पूर्णमासी की रात में जितना खीर खा सकें, उतने दूध में चावल (इस खीर में अरबा चावल उत्तम माने जाते हैं) डालकर खीर बनाएं। इस खीर को कांसे की थाली में डालकर फैलाकर, इस पर ढाई चम्मच गूलर की छाल का चूर्ण चारो और छिड़क दें। खीर रात को नौ बजे तक तैयार कर लें। इसे रात को नौ बजे से सुबह के चार बजे तक खुले स्थान पर चांदनी में रखें। सुबह चार बजे के तुरन्त बाद इसे भर पेट खा लें। खीर खाने से पहले मंजन करके मुंह को साफ कर लें। आम के हरे पत्ते से खीर खाएं। इसके बाद धीरे-धीरे थकान नहीं हो तब तक घूमते रहें। इससे दमा रोग में लाभ मिलता है।
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1 छुहारे की गुठली निकालकर उसमें गूलर के दूध की 25 बूंद भरकर सुबह रोजाना खाये इससे वीर्य में शुक्राणु बढ़ते हैं तथा संतानोत्पत्ति में शुक्राणुओं की कमी का दोष भी दूर हो जाता है।
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1 चम्मच गूलर के दूध में 2 बताशे को पीसकर मिला लें और रोजाना सुबह-शाम इसे खाकर उसके ऊपर से गर्म दूध पीएं इससे मर्दाना कमजोरी दूर होती है।
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पका हुआ गूलर सुखाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में इसी के बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी बोतल में भर कर रख दें। इस चूर्ण में से 2 चम्मच की मात्रा गर्म दूध के साथ सेवन करने से मर्दाना शक्ति बढ़ जाती है।
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गूलर के दूध में रूई का फोहा भिगोंकर इसे नासूर और भगन्दर के ऊपर रखें और इसे प्रतिदिन बदलते रहने से नासूर और भगन्दर ठीक हो जाता है।
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गूलर के पत्तों या फलों के दूध की 10 से 20 बूंदे को पानी में मिलाकर रोगी को पिलाने से खूनी बवासीर और रक्तविकार दूर हो जाते हैं। गूलर के दूध का लेप मस्सों पर भी लगाना लाभकारी है।
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10 से 15 ग्राम गूलर के कोमल पत्तों को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। 250 ग्राम गाय के दूध की दही में थोड़ा सा सेंधानमक तथा इस चूर्ण को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से खूनी बवासीर के रोग में लाभ मिलता है।
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4 से 6 ग्राम गूलर के फल का चूर्ण और बिदारी कन्द का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्री और घी मिले हुए दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पौरुष शक्ति की वृद्धि होती है व बाजीकरण की शक्ति बढ़ जाती है। यदि इस चूर्ण का उपयोग इस प्रकार से स्त्रियां करें तो उनके सारे रोग ठीक हो जाएंगे।
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5 से 10 ग्राम गूलर की ताजी जड़ के रस में चीनी मिलाकर सुबह-शाम पीने से पित्त ज्वर ठीक हो जाता है।
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1 ग्राम गूलर की गोंद और 3 ग्राम चीनी को मिलाकर सेवन करें इससे पित्त की जलन दूर होती है।
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गूलर के पत्तों को पीसकर शहद के साथ चाटने से पित्त विकार दूर होते हैं।
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गूलर के दूध की 10 बूंदे सुबह और शाम दूध में मिलाकर बच्चों को पिलाने से बच्चों को उल्टी आना बंद हो जाता है।
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गर्भावस्था में खून का बहना और गर्भपात होने के लक्षण दिखाई दें तो तुरन्त ही गूलर की छाल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में अथवा 2 से 4 गूलर के फल को पीसकर इसमें चीनी मिलाकर दूध के साथ पीएं। जब तक रोग के लक्षण दूर न हो तब तक इसका प्रयोग 4 से 6 घंटे पर उपयोग में लें।
गूलर की जड़ अथवा जड़ की छाल का काढ़ा बनाकर गर्भवती स्त्री को पिलाने से गर्भस्राव अथवा गर्भपात होना बंद हो जाता है।
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हरड़ व शुद्ध गूलर को खाने के बाद ऊपर से गाय के पेशाब को पीये इससे जांघों की सूजन व दर्द दूर हो जाता है।
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लगभग 100 ग्राम की मात्रा में गूलर के कच्चे फलों का चूर्ण बनाकर इसमें 100 ग्राम मिश्री मिलाकर रख दें। अब इस चूर्ण में से लगभग 10 ग्राम की मात्रा में रोजाना दूध के साथ लेने से शरीर को भरपूर ताकत मिलती है।

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